My Book Of Life Poem – Hemangi Sharma

my book of life poem

My Book Of Life Poem

My Book Of Life Poem by our guest writer Mrs. Hemangi Sharma.

Title : ज़िन्दगी की किताब.

ज़िन्दगी भी एक किताब ही तो है,
कुछ पन्नें आधे अधूरे रह गए है,
और कुछ की शाही उड गई है,
चाहकर भी कुछ लम्हों को पन्नों में कैद नही कीया जा सकता,
कुछ बातो को पन्नों पे सजाया भी तो नहीं जा सकता,
ज़िन्दगी में क्या पाया क्या खोया उस का हिसाब कौन सी किताब में होता है!
कुछ मूडे हुए पन्नें फिर कभी ना सीधे हो पाए,
ना फटे पन्नों को फिर से वो तवज़्जो मिली,
ज़िन्दगी की किताब में बस लिखते गए लिखते ही गए,
ना कभी ठहर के सोचा ना ही कभी उन पन्नों को पढने की या दूबारा देखने की ख्वाहिश रख्खी,
हर पन्नें को तेरा तोह्फा समज़ कर जीते गए पीते गए,
हेमांगी

A very beautiful poem explaining life as a book. There are many pages where the ink have faded, many pages that are torn. Some pages are incompletely written. Still we always start with a new page and try to make this book more interesting. We also keep searching some incomplete parts in old pages and try to complete them.

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